तन्हाई

तन्हाई



मैं क्यों सदा तन्हा रही
खुशियों से महरूम रही रुसवा रही
हर पल दर्द से बोझिल रही मैं'
पलकों में आंसू रहे सदा
ना कोई हमसफ़र मेरा ,
सांस लेना भी नुश्किल हुआ !
क्या खता थी मेरी
क्यू मैं सदा तन्हा रही
गुमसुम रही , अकेली रही !
न उम्मीद रही
न रौशनी रही ,
किस बात की सजा मिली
क्यों जिन्दगी नीर ' के साथ खेलती रही
क्यू हर कोई जज्बातों के साथ खेलता रहा !
आँसुओ में डुबोता रहा ,
हर पल तमाशा बनी ' नीर '
तन्हा रही अकेली रही !



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5 comments

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30 July 2013 at 02:12 delete

आपकी यह पोस्ट आज के (३० जुलाई, २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - एक बाज़ार लगा देखा मैंने पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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Neera Jain
AUTHOR
31 July 2013 at 02:59 delete

thanx a lot tushar ji regards

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6 August 2013 at 01:52 delete

ह्रदय स्पर्शी ......

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